दीपावली के पावन पर्व पर डोईवाला के प्रेमनगर बाजार से जुड़ी एक बेहद सुंदर और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। यहाँ रामसिंह प्रजापति का पूरा परिवार पीढ़ियों से चली आ रही अपनी पुश्तैनी कला को जिंदा रखते हुए मिट्टी के दीये और पारंपरिक वस्तुएं बनाने में पूरी शिद्दत से जुट गया है।
आधुनिक दौर में बिजली की रंग-बिरंगी झालरों का चलन भले ही बढ़ गया हो, लेकिन दीपावली की असली चमक मिट्टी के दीयों के बिना अधूरी ही मानी जाती है। पूजा-पाठ से लेकर घरों की चौखट और आंगनों को रोशन करने के लिए आज भी लोग पारंपरिक दीयों को ही प्राथमिकता देते हैं।
इस पुश्तैनी काम को आगे बढ़ाने में रामसिंह प्रजापति अकेले नहीं हैं, बल्कि उनकी इस कला में पूरा परिवार उनका मजबूत सहारा बना हुआ है। उनकी पत्नी शांति, दोनों बेटे और बहुएं—सभी मिलकर मिट्टी को सहेजने, उसे सुंदर आकार देने और दीये तैयार करने में हाथ बंटा रहे हैं।
रामसिंह बताते हैं कि दीपावली जैसे बड़े त्योहार पर जब उनके बनाए दीये लोगों के घरों को रोशन करते हैं, तो उन्हें और उनके पूरे परिवार को बेहद संतोष और खुशी मिलती है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा न सिर्फ उनकी रोजी-रोटी का जरिया है, बल्कि भारतीय संस्कृति और लोककला को सहेजने का एक अनूठा प्रयास भी है।

